अमेरिका ईरान पायलट रेस्क्यू ऑपरेशन: पहाड़ों में फंसे कर्नल को बचाने की पूरी और रोमांचक कहानी

अमेरिका ईरान पायलट रेस्क्यू ऑपरेशन: कैसे बचाई गई ईरान के पहाड़ों में फंसे दो अमेरिकी एयरमैन की जान
अमेरिका ईरान पायलट रेस्क्यू ऑपरेशन को अमेरिकी सैन्य इतिहास के सबसे जोखिम भरे और बड़े कॉम्बैट रेस्क्यू मिशनों में गिना जा रहा है। यह घटना अप्रैल 2026 की है, लेकिन इसका पूरा और रोमांचक ब्योरा अब जाकर सार्वजनिक हुआ है — पहले व्हाइट हाउस ब्रीफिंग में, और हाल ही में 14 सितंबर 2026 को CBS के "60 मिनट्स" कार्यक्रम में, जहां खुद पीड़ित एयरमैन ने अपनी आपबीती सुनाई।
जब आसमान में मार गिराया गया अमेरिकी फाइटर जेट
3 अप्रैल 2026 की सुबह, अमेरिकी वायुसेना की 494वीं फाइटर स्क्वाड्रन का एक F-15E स्ट्राइक ईगल, कॉलसाइन "DUDE44", ईरान के मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम से जुड़े ठिकानों पर हमला करने के बाद वापस लौट रहा था। तभी कम ऊंचाई पर उड़ रहे इस विमान को ईरान की एक कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल (MANPADS) ने निशाना बना लिया। यह "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" के दौरान दुश्मन की गोलाबारी से गिरने वाला पहला अमेरिकी लड़ाकू विमान था। विमान के दोनों क्रू मेंबर — पायलट (कॉलसाइन "अल्फा") और वेपन्स सिस्टम्स ऑफिसर, एक कर्नल (कॉलसाइन "ब्रावो") — को इजेक्ट होकर ईरानी धरती पर उतरना पड़ा।
पहला रेस्क्यू: पायलट को बचाने के लिए दिनदहाड़े हमला
रेस्क्यू बीकन एक्टिवेट होते ही अमेरिकी सेंट्रल कमांड हरकत में आया। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की सिफारिश और राष्ट्रपति के आदेश पर तुरंत एक कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू (CSAR) टास्क फोर्स तैयार की गई, जिसमें 10 A-10C थंडरबोल्ट जेट, HC-130J विमान, HH-60W हेलीकॉप्टर और स्पेशल ऑपरेशन के जवान शामिल थे। यह टीम दिन के उजाले में ही दुश्मन के इलाके में घुसी। इस दौरान भीषण गोलीबारी हुई, जिसमें एक A-10 विमान को भी नुकसान पहुंचा, लेकिन उसका पायलट सुरक्षित दूसरे देश में उतरने में कामयाब रहा। पायलट को उठाते वक्त रेस्क्यू हेलीकॉप्टर पर भी छोटे हथियारों से फायरिंग हुई, जिसमें कुछ क्रू मेंबर मामूली घायल हुए। पायलट को शुक्रवार दोपहर तक सुरक्षित निकाल लिया गया, हालांकि उसे गंभीर चोटें आई थीं।
दूसरा एयरमैन: अकेला, घायल और पहाड़ों में फंसा
असली चुनौती अब शुरू हुई। 
कर्नल पायलट से कई किलोमीटर दूर एक अलग जगह जा गिरा था, बुरी तरह घायल हालत में। वह ऐसे इलाके में फंसा था जहां IRGC के लड़ाके, बासिज मिलिशिया और स्थानीय सुरक्षाबल उसे ढूंढ रहे थे। ईरान ने उसे पकड़ने या मारने पर बड़ा इनाम भी घोषित कर दिया था। पेंटागन ने उसे उस दिन "DUSTWUN" (यानी लापता) घोषित कर दिया। लेकिन प्रशिक्षण के मुताबिक कर्नल ने खुद को बचाने के लिए ऊंचे और खतरनाक पहाड़ी इलाके की ओर चढ़ना शुरू किया, ताकि पकड़े जाने से बच सके।
सैटेलाइट डिवाइस और पहचान की पुष्टि
कर्नल के पास एक कॉम्बैट सर्वाइवर इवेडर लोकेटर (CSEL) डिवाइस था, जो सैटेलाइट के जरिए छोटे-छोटे सुरक्षित सिग्नल भेज सकता है। इसी डिवाइस से उसने अपनी हालत के बारे में संदेश भेजे। टीम को यकीन दिलाने के लिए उससे एक ऐसा निजी सवाल पूछा गया जिसका जवाब सिर्फ वही जानता था — कर्नल ने सही जवाब देकर अपनी पहचान साबित की।
रेगिस्तान में एक इंसान को ढूंढना: CIA का किरदार
कर्नल को खोजने में CIA की खास तकनीक ने अहम भूमिका निभाई। एजेंसी के निदेशक जॉन रैटक्लिफ ने इस काम की तुलना रेगिस्तान में एक कण को ढूंढने से की। एक कैमरा करीब 40 किलोमीटर दूर से पहाड़ पर हलचल को लगातार 45 मिनट तक मॉनिटर करता रहा, जब तक कर्नल हिलकर खड़ा नहीं हुआ और उसकी पुष्टि नहीं हो गई। साथ ही, ईरानी सेना ने विमान की इजेक्शन सीट पर कुत्तों से सूंघकर उसका पता लगाने की कोशिश भी की, जो नाकाम रही।
दुश्मन को गुमराह करने की रणनीति
समय खरीदने के लिए CIA ने एक डिसेप्शन प्लान भी चलाया। जानकारी फैलाई गई कि "पैकेज" (यानी कर्नल) को गाड़ी से समुद्री रास्ते की ओर ले जाया जा रहा है, ताकि तलाश कर रहे ईरानी बलों का ध्यान असली जगह से भटक जाए। इस दौरान सात अलग-अलग जगहों पर गतिविधियां दिखाई गईं ताकि ईरानी सेना कन्फ्यूज हो जाए और असली रेस्क्यू पॉइंट का पता न लगा सके।
खेत में बना अस्थायी एयरबेस
रेस्क्यू टीम ने एक खेत को अस्थायी फॉरवर्ड एयरबेस के रूप में इस्तेमाल किया, जहां दो भारी-भरकम MC-130J मालवाहक विमान उतारे गए, जिनके अंदर छोटे MH-6 हेलीकॉप्टर भी मौजूद थे। यह जगह रनवे जैसी बिल्कुल नहीं थी — गीली और रेतीली मिट्टी की वजह से दोनों बड़े विमान वहीं फंस गए। हेलीकॉप्टरों ने वहां से करीब 7 मिनट उड़ान भरकर कर्नल तक पहुंच बनाई और उसे लेकर वापस लौटे। इसके बाद संवेदनशील तकनीक ईरान के हाथ न लगे, इसलिए फंसे हुए दोनों बड़े विमानों और हेलीकॉप्टरों को वहीं उड़ा दिया गया, और टीम को एक अलग, हल्के विमान से बाहर निकाला गया।


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